रविवार, १४ डिसेंबर, २०२५

महफ़िल



महफ़िल 
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यारों के दिलदारों के टीकट आ रहे हैं ।

 महफ़िलों के रंग अब सूने हो रहे हैं ।

तुम किस सुबह का इंतजार कर रहे हो? 

चार पाँच पल बचे हैं मुफ्त गँवा रहे हो।

सोने से पहले, विक्रांत! थोड़ा-सा जाग लो।

वह चाँदनी ढूँढो अंदर और उसे गले लगा लो।

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© डॉ.विक्रांत प्रभाकर तिकोणे 
https://kavitesathikavita.blogspot.com  
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