रविवार, १४ डिसेंबर, २०२५

महफ़िल



महफ़िल 
*******

यारों के दिलदारों के टीकट आ रहे हैं ।

 महफ़िलों के रंग अब सूने हो रहे हैं ।

तुम किस सुबह का इंतजार कर रहे हो? 

चार पाँच पल बचे हैं मुफ्त गँवा रहे हो।

सोने से पहले, विक्रांत! थोड़ा-सा जाग लो।

वह चाँदनी ढूँढो अंदर और उसे गले लगा लो।

🌾🌾🌾
© डॉ.विक्रांत प्रभाकर तिकोणे 
https://kavitesathikavita.blogspot.com  
☘☘☘☘ 🕉️ 



कोणत्याही टिप्पण्‍या नाहीत:

टिप्पणी पोस्ट करा

दिगंबर आजबे

स्व . दिगंबर आजबे *********** दिगंबर उर्फ डिगा आजबे जामखेड मधील सातवी आठवीच्या वर्गात माझ्याबरोबर शिकत होता . दत्ता आणि डिगा सख्...